Saturday, March 09, 2013

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बुंदेलखंड की पीर बनेगा रेल नीर !

जल-जीवन को परिभाषित करता ये चित्र 
 नीर का नीड़ उजाड़ने की तैयारी--------
आशीष सागर    
पानी के संकट के चलते कई जिलों के किसान साल में बमुश्किल एक ही फसल की उपज ले पाते हैं। ठंड में ही तमाम नहरें सूख गई हैं, नदियों का पानी भी तलहटी में पहुंच गया है। आने वाली गर्मी की दस्तक बुंदेलखंड के लिए यकीनन खुशी की बयार तो नहीं ही लाने वाली है किसान खून के आंसू रोने को मजबूर होगा, कहीं नलकूप जबाब देंगे तो कहीं पानी लूटने की वारदात खूनी जंग को अमलीजामा पहनाएगी। हाल ही में 2013 के रेल बजट में बुंदेलखंड के साथ सौतेला व्यवहार करने से रूबरू कराती रिपोर्ट़़.......
 ललितपुर। झांसी, ललितपुर, महोबा, जालौन, चित्रकूट, और बांदा में पहले से ही पानी का संकट है। ऐसे में नहरें, तालाब व नदी किसान का साथ छोड़ दे तो अचरज की बात नहीं है। पूरे बुंदेलखंड में 480 किमी नहरों का अस्तित्व संघर्ष की स्थिति में है। अकेले चित्रकूट और बांदा के हालात ही इतने खराब हैं कि यहां 202 किमी नहर का बजूद खत्म होकर कच्ची सड़क की पगडंडी में तब्दील होता जा रहा है। झांसी, बांदा, हमीरपुर व जालौन में सबसे अधिक नहरों का संजाल है। लेकिन कोई भी नहर ऐसी नहीं है जहां टेल तक पानी पहुंच पाता हो। रबी की बुआई हो या फिर खरीफ की फसलें बुंदेलखंड में रामराज्य की कल्पना पानी की इबारत पर लिखना टेढ़ी खीर है। जिन नदियों से नहरें निकली हैं उनमें केन, उर्मिल, धसान, बेतवा, यमुना, पहुज आदि हैं। झांसी के भसनेह माइनर में तो सालों से पानी ही नहीं आया है जबकि यह पूरी तरह सीमेंट से बनाया गया है। तमाम नदियां छोटी-बड़ी नहरों को आपस में जोड़ती हैं। बुंदेलखंड के 7 जिलों में 1752 नलकूप 22 दिसंबर 2012 तक लगाए गए हैं। इसमें से 152 खराब हो चुके हैं। सबसे अधिक 73 नलकूप बांदा तथा 63 नलकूल जालौन में खराब पड़े हैं। 

    केंद्रीय जल आयोग के अनुसार पिछले वर्ष की तुलना में इस वर्ष केन का जल स्तर 10 सेमी घटा है। मानिकपुर में रेलवे को प्रतिदिन 25 हजार लीटर पानी की जरूरत होती है। कम पड़ने पर इस पानी की पूर्ति रेलवे झांसी से रेल द्वारा पूरा करता है। जल स्तर गिरने से केन और यमुना नदी में लगा इनटैक वॉल में पानी सप्लाई करना बंद कर देता है, ऐसे में टैंकर से पानी पहुंचता है। हमीरपुर में 26.44 एमएलडी पानी की मांग है। अभी तक शहरी इलाके में पानी की अपूर्ति ठीक है और ग्रामीण इलाकों में 76 पेयजल योजनाएं संचालित हैं। 17 हजार 172 हैंडपंप से जलापूर्ति की जाती है। कुल 1252 तालाब हैं जिनमें 705 तालाबों को प्रशासन भरने का दावा करता है, जबकि 547 अभी भी सूखे ही पड़े हैं। इस जिले के मौदहा व सरीला क्षेत्र के करीब एक दर्जन गांव जल संकट से ग्रसित हैं। खेती को अब पानी की जरूरत पड़ी तो 4 मार्च 2013 की जानकारी के मुताबिक किसानों को नहर विभाग से कोई मदद नहीं मिलेगी। रबी की फसल के लिए बांधों में पानी खत्म हो चुका है। गर्मी में अन्ना पशुओं की प्यास और आम आदमी के हलक को तर करने की कवायद में सिंचाई विभाग पसोपेश में है। बांदा जिले के अधिशासी अभियंता दीपक कुमार झा बताते हैं कि रनगवां बांध में उपलब्ध 779 मिलियन घन फीट मिलेगा शेष पानी मध्य प्रदेश के हिस्से में जाएगा। बांदा में कुल भूमि 4 लाख 38 हजार 500 हेक्टेयर है जिसमें कि 1 लाख हेक्टेयर भूमि ऐसी है जो सिंचाई के अभाव में परती है। नहरों की कुल लंबाई 1193 किमी है मगर फिर भी 132 नहरों में आज तक टेल में पानी नहीं पहुंच पाया है। जिले में राजकीय नलकूपों की संख्या 513 है। किसानों के निजी नलकूल 415 हैं, राजकीय नलकूप 73 खराब पड़े हैं। 
केन नदी पर निर्मित पुल 
    हमीरपुर जिले में 101 कुल नहरें हैं, 521 सरकारी नलकूपों की संख्या है और 11 खराब नलकूप हैं। यहां 314470 हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि है। चित्रकूट जिले में 611 किमी नहरों का जाल है। कुल 127 नहरें हैं इनमें से 8 मुख्य नहरें हैं और 99 छोटी व 20 माइनर हैं। चित्रकूट में 6 राजकीय नलकूप हैं इनका संचालन भी किसानों की जरूरत के हिसाब से होता है। जिले में 170228 हेक्टेयर कृषि क्षेत्रफल हैं जिसमंे कि 8168 हेक्टेयर क्षेत्रफल में 2 फसलें हो पाती हैं। महोबा जिले में 103 नहरों की संख्या है, 40 नहरों में पानी आता है। 2 सरकारी ट्यूबवेल हैं। जिले का कुल कृषि क्षेत्रफल 2 लाख 9 हजार 9 हेक्टेयर है, वहीं झांसी जिले में कृषि योग्य बोया गया कुल क्षेत्रफल 305.573 हेक्टेयर है। जिले में नहरों की कुल लंबाई 3671.60 किमी है। कुल 104 नलकूल चालू हालत में है। 6 बड़ी मुख्य नहरें बेतवा, बड़गांव पंपनहर, गुरसरांय नहर, पहुंज नहर, गढ़मउ नहर, बडवार नहर हैं।
    जालौन में 3,48,000 हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि है व 2100 किमी लंबी नहरें हैं। 605 सरकारी नलकूप हैं जिसमें 65 खराब हैं। ललितपुर जिले में 4 लाख 98 हजार हेक्टेयर कृषि क्षेत्र है। ललितपुर में नहरों की संख्या 11 व सरकारी नलकूप मात्र 1 है यह विकासखंड महरौनी के ग्राम भडौला में स्थित है, जो 2 साल से खराब पड़ा है। वर्ष 2011-12 में बुंदेलखंड की 7 नदियां सूख गईं थीं। यह आने वाली गर्मी इस सूखी पट्टी के उपर भारी पड़ेगी। इसमें संदेह नहीं है।

वर्ष 2010 की स्थिति -
पाठा में 76 मीटर तक नीचे गया भूगर्भ जलस्तर 
चित्रकूट में बरगढ़ से लेकर मारकुंडी तक फैले पाठा क्षेत्र में भूजल स्तर 76.2 मीटर नीचे जा चुका था। करौहा ग्राम पंचायत के गोपीपुर, छेरिहा खुर्द ग्राम पंचायत, बरहामाफी, इटवा डुडैला, छोटी और बड़ी पाटिन जैसे गांवों में ग्रामीण बैलगाड़ी पर टंकी बांधकर डेढ़ से दो किमी दूर से पानी लाते हैं।
महोबा में 100 से ज्यादा तालाब सूखे
महोबा जिले में कुल 137 तालाब हैं जिनमें से 100 से ज्यादा तालाब अतिक्रमण, सिल्ट के चलते सूख चुकें हैं। कीरत सागर, मदन सागर, बीजानगर जलाशय, दशरापुर जलाशय, कल्याण सागर, बेलाताल, कुल पहाड़, कमालपुरा जलाशय, रहिल्य सागर, रैपुरा जलाशय से महोबा की नहरें निकलती थीं जो तालाबों में जलाभाव के चलते दम तोड़ चुकी हैं। तीन बांध और 18 बड़ी बंधियां पूरी तरह सूख गईं हैं। नलकूप अंतिम यात्रा पर निकल रहे हैं।

बांदा जिले के 4540 तालाब बदहाली की कगार पर
बांदा में 4540 तालाब के 1537.122 हेक्टेयर क्षेत्रफल में दंबग और दादुओं का कब्जा है। सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट के आदेश तालाबों के अतिक्रमण हटवाने में कूड़ेदान के रद्दी कागज से अधिक हैसियत नहीं रखते हैं। हद तो तब हो जाती है जब आती-जाती सरकारों के मंत्री और उनके सगे संबंधी भी ऐतिहासिक तालाबों पर कब्जा जमाए बैठे हों। अकेले जनपद बांदा सदर के लाल डिग्गी, परशुराम, हरदौल तलैया, बाबूराव गोरे, कंधरदास, छाबी तालाब, साहब तालाब, प्रागी तालाब की जमीनों पर दबंगई से प्रशासन की नाक तले कब्जा है। यह वे ही तालाब हैं जो कभी नबाब टैंक की तरह बांदा की शान हुआ करते थे। यही हाल झांसी शहर के लक्ष्मी तालाब, मउरानीपुर में सुखनई नदी और बाजपेयी तालाब, ललितपुर में सुमेरा तालाब, तालबेहट का भी हाल हैं।
बावजूद इसके केंद्रीय रेलमंत्री पवन कुमार बंसल ने संसद की बंद दीवारों के बीच बुंदेलखंड को पानी के व्यापार की मंडी बनाने का खाका रेल बजट 2013 में प्रस्तुत किया है। बुंदेलखंडवासियों ने ढेरों उम्मीदें रेल बजट से लगा रखीं थी, लेकिन बजट की एक अंगडाई ने उनकी उम्मीदों को लाल झंडी दिखा दी। ललितपुर जिले में केंद्रीय रेल मंत्री ने रेल नीर बॉटलिंग प्लांट लगाने की घोषणा की है। उनका दावा है कि इस प्लांट के जरिए सैकड़ों लोगों को प्रत्यक्ष रूप से रोजगार के अवसर मिलेंगे और बूदेलखंड में पलायन पर अंकुश लगेगा। लेकिन हालात इस रेल नीर से इतर उस सच को भी बयान करते हैं जिसे हमारे केंद्रीय रेल मंत्री ने दिल्ली की संसद के अंदर बैठकर महसूस करने की कोशिश नहीं की।

    गौरतलब है कि ललितपुर जिले में रेल बजट के अंतर्गत लगाए जाने वाले रेल नीर प्लांट से प्रतिदिन 3.80 लाख लीटर बोतल पानी की जरूरत होगी। एक बोतल का मूल्य 15 रुपए लगभग होगा। इससे रेलवे को प्रतिदिन करीब 60 लाख रुपए का लाभ होगा। पानी के इस व्यापार के ऐसी क्या जरूरत बंुदेलखंड के सूखाग्रस्त इलाके में केंद्रीय रेल मंत्री पवन कुमार बंसल को समझ में आई यह समझ से परे है। कहीं न कहीं बंुदेलखंड के केंद्रीय ग्रामीण राज्य विकास मंत्री और झांसी से ताल्लुकात रखने वाले प्रदीप जैन आदित्य के लिए आने वाले लोकसभा चुनाव 2014 में यह ललितपुर का रेल नीर प्लांट सीधे तौर पर जनता को महज रेल बजट का अबूझ झुनझुना ही लगता है। आखिर प्रतिदिन 4 लाख लीटर पेयजल प्लांट के लिए कहां से सुलभ होगा यह भी रेल मंत्री को बजट के दौरान बताना चाहिए था। क्या यह जमीन का सीना चीरकर निकाला जाएगा या फिर ओरक्षा के रास्ते पाइप लाइन के जरिए सुलभ होगा अथवा बेतवा की तलहटी में उछल-कंूद कर रही आंशिक लहरों से यह पानी बंद बोतलों में बेचा जाएगा। 
केन नदी 

    बुंदेलखंड में पहले से ही केंद्र सरकार की बड़ी पेयजल योजनाएं पर्यावरण प्रहरी, समाजिक कार्यकर्ताओं, किसानों के सवालों के कटघरे में खड़ी हैं, मसलन केन-बेतवा लिंक परियोजना, अर्जुन सहायक बांध परियोजना और बरियारपुर बांध को दुरूस्त किए जाने की योजना। बुंदेलखंड पैकेज से 7266 करोड़ रुपए खपाने के बाद एक बार फिर 590 करोड़ रुपए सियासत के रंगमंच में झूठे वादों के साथ वोटों की खातिर जनता को रामलीला करते नजर आएंगे। ललितपुर से लेकर जालौन, टीकमगढ़, मउरानीपुर, चित्रकूट आदि क्षेत्रों में बनाए गए सैकड़ों कूपों, नलकूपों की हकीकत खुद प्रदीप जैन आदित्य, योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोटेक सिंह आहलुवालिया परख चुके हैं। कागजों में बनाए गए 2 फीट गहरे कुएं और आधे-अधूरे चेकडेम तो बुंदेलखंड की बदहाल बारिश का पहला कहर भी नहीं झेल पाए और बहती हुई पानी की धारा के साथ कागज की कश्ती की तरह बह गए। केंद्र सरकार की चाहे जो भी मंशा रेल बजट 2013 में बुंदेलखंड को छले जाने की रही हो मगर पानी के व्यापार का बाजार बुंदेलखंड जैसे इलाकों को तो हरगिज ही नहीं बनाया जाना चाहिए था। क्या नई रेल देने, झांसी से वाया बांदा-मानिकपुर तक सिंगल लाइन पटरी के दोहरीकरण करने, दिल्ली से वाया झांसी-इलाहाबाद नई रेल चलाने से यहां के लोगों को रोजगार के अवसर उपलब्ध नहीं होते ? और क्या पर्यटन की दृष्टि से झांसी, ओरक्षा, महोबा की चरखारी तहसील, बांदा जिले के कालिंजर, चित्रकूट जैसे अति महत्वपूर्ण पर्यटक स्थलों तक नए रेल यातायात सुलभ कराने से रेलवे को आर्थिक लाभ नहीं होता ? ऐसा क्यों और किन हालातों में नहीं किया गया इसका माकूल जवाब जनपथ में बैठे हुए सियासी हुकमरान ही दे सकते हैं।

    बुंदेलखंड में सबसे ज्यादा प्रभावित इलाके

क्षेत्र                          अगस्त 2009        वर्तमान     गिरावट ;आंकडे मीटर मेंद्ध
हमीरपुर (मौदहा)         7.60             11.45                          3.85
ललितपुर (मंडवारा )      3.30           7.10                          3.80
चित्रकूट ( हरीसनपुरा )    14.10          17.13                         3.3
बांदा (चिल्ला )              14.60             17.16                        2.56
जालौन (बांगर  )           2.65                      4.95                         2.30
महोबा                         10.82                         12.02                  1.22                                                          स्रोत- केंद्रीय भूमिजल बोर्ड
 


आशीष सागर (लेखक सामाजिक कार्यकर्ता है, वन एंव पर्यावरण के संबध में बुन्देलखण्ड अंचल में सक्रिय, प्रवास संस्था के संस्थापक के तौर पर, मानव संसाधनों व महिलाओं की हिमायत, पर्यावरण व जैव-विविधता के संवर्धन व सरंक्षण में सक्रिय, चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय से एम०एस० डब्ल्यु० करने के उपरान्त भारत सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय के उपक्रम कपाट में दो वर्षों का कार्यानुभव, उत्तर प्रदेश के बांदा जनपद में निवास, इनसे ashishdixit01@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं)

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