Monday, December 22, 2014

23 दिसंबर 2014 विश्व किसान दिवस !

समाजवाद का ये ही नारा- नही मरा किसान हमारा 


गत 26 फरवरी को विधान सभा सत्र में उत्तर प्रदेश के बाँदा जिले से कांग्रेस के विधायक दलजीत सिंह ने और हमीरपुर  से भाजपा विधायक साध्वी निरंजन ज्योति ने बुंदेलखंड में किसान आत्महत्या और कर्ज से खुदकुशी का मामला प्रश्नकाल में उठाया , साध्वी निरंजन ने बाकायदा किसानो के नाम गिनवाकर सदन से पूछा कि बुंदेलखंड का किसान कर्ज से टूट कर आत्महत्या क्यों कर रहा है ? अब तक कितने किसानो ने बुंदेलखंड में आत्महत्या की है ? बुंदेलखंड समेत देश के आदिवासी परिवारों की बहनों , माँ को भले ही अपने दुधमुंहे बच्चे को सुखी देह से ममता का पान कराना पड़े l यूज़ भले ही दुलार की तलाश में बाँट जोहती बच्ची को फांका करवाना पड़े लेकिन लोकसेवको के वेतन , सुखसुविधा में कोई कमी नही आती ये अपने आप में अजूबा है !

 राजस्व मंत्री अम्बिका चौधरी से जानना चाहा कि किसानो का इस बेमोसम बारिस से कितना नुकसान हुआ , किसान को कितना मुआवजा दिया जायेगा और कब ? इस पर जवाब में सपा के शिवपाल सिंह यादव और राजस्व मंत्री ने कहा कि बुंदेलखंड का आज तक कोई किसान कर्ज से नहीं आत्महत्या किया है ! जबकि बीते साल के अंत तक बुंदेलखंड में 3269 किसानो ने कर्जखोरी में आत्महत्या की है l और 7 जनवरी 2014 से 14 नवम्बर 2014 तक कुल 58 किसान आत्महत्या से जान दिए है l जहाँ तक कर्जमाफी का सवाल है तो समाजवादी सरकार ने बुंदेलखंड में 29928 किसानो का 62 करोड़ 82 लाख 74 हजार 617 रुपया कर्जा माफ़ किया है ! यहाँ ये भी बतलाना है कि बुंदेलखंड का अधिकतर किसान  बड़े बैंक मसलन एसबीआई, इलाहाबाद यू.पी. ग्रामीण बैंक अन्य का कर्जा लिए है जबकि न के बराबर किसान कापरेटिव बैंक से कर्जा लिए है जिसका कर्जा समाजवादी सरकार ने माफ़ किया है l चुनाव पूर्व इसी सरकार के नेताओ ने किसानो का पूरा कर्जा माफ़ किये जाने की घोषणा की थी l सरकार ने कभी ये माना ही नही कि कोई किसान कर्ज से मर रहा है ये सरकार रही हो या और कोई l मगर हाँ जब जिसकी सरकार नही होती है तो अवश्य विपक्षी दल किसान को मुद्दा बनाने का काम कर रहा होता है सत्ता आने पर सब भूल जाते है इस किसान को l लोकसभा चुनाव 2014 में हर पार्टी का अपना चुनावी मेनिफेस्टो – घोषणा पत्र बना l विकास के बरगलाने वाले और अच्छे दिनों के ख्याली मुद्दों के साथ केंद्र सरकार भी बन गई l माननीय लोगो के अगर पिछले 5 साल के रिपोर्ट कार्ड देखे जाये तो शायद कोई सांसद अपने मतदान क्षेत्र में एक माह भी लगातार रहा हो ये बड़ी बात है l क्यों हर लोकसभा या विधान सभा क्षेत्र का घोषणा पत्र वहां की आवाम या किसान के साथ बैठकर तैयार नही किया जाता है ? आखिर क्यों जनता से ये नही पूछना वाजिब समझा जाता है कि आपको विकास किन शर्तो पर और किस स्वरुप में चाहिए ? केन – बेतवा नदी गठजोड़ जैसी प्रकृति विरोधी बांध परियोजना बनाकर केन्द्रीय जल संसाधन मंत्री उमा भारती कौन सा जल संकट समाधान करने जा रही है ? नपुंसक बीजो पर खेतो में तैयार होती फसले सरकारी खाद और बीज गोदाम के चक्कर लगाकर कमीशन खोरी में तरबतर है l ओला, पाला या सूखे से टूटे खेतो की जान लेने की  ज़िम्मेदार ये किसान नीतियाँ ही है जिनमे किसान हित नही होता बल्कि किसान को  कर्जदार , मुफ्तखोर बना देने की साजिश होती है l यह सियासत को ही तय करना पड़ेगा, किसान को गर अन्नदाता मानकर चलते है तो चुनाव के पहले और बाद में उसको कृषि नीति में सहभागी नियोक्ता के रूप में रखना चाहिए l नदी – बांध परियोजना बनाते समय किसान – आदिवासी  लोगो से सुझाव लेना चाहिए l 


आशीष सागर दीक्षित 

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